प्राइवेटकॉम

ब्रात नहीं जाती ।
औओरत--इन बातों को सममने के लिए जरा अ्रक्‍्ल चाहिएु।
यह कहकर बधने पिंजड़ा उठाया और चडी गई ।
थोड़ी देर में दारोग्रान्‍्षाहत ने अन्दर भाकर कट्ठा- ठरवाजे पर थाने-
दार औ सिपाही से हैं। मिरज्ञा आजाद जेह से भाग निकछे, हैं ।
झोर वही ध्ाज झौरत के घेप से भाए थे। वेग्मसाहव के दोश-हवास
ग़ायत्र हो गए। अरे ! यह आजाद थे !
नह
ह।
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सरसठवाँ पारिच्छेद
आज़ाद अश्रपती फ़ोन के साथ पक्र मेदान में पडे हुए थे कि एक
धवार ने फ़ोन में ओकर कहा--+अमी विगुल दो | दुश्मन सिर पर आा
पहुँचा । बिगुउ की श्रावाज़ सुनते दी श्रंक़सर, प्यादे, सवार सत्र चौंक
पढे | सवार एंडते हुएं चले, ' ध्यादे अकड़ने हुए बढ़े । एक बोका--म्रार
लिया है, दूसरे ने कह्ा--भर्गा दिया है। मगरे अभी तक किसी को
.. माछूम नहीं कि दुश्मन कहाँ है। मुज़बिर दौड़ाए गए तो पता चला कि
रूप की फ़ौज दरिया के उश्त पार परे जमाए खड़ी है। दरिया पर पुछ
बताया जा रहा है भोर अ्रनोखी बात यद् थी कि रुधी फ़ौज के साथ एक
लेडी, शहसतवारों की तरह रान-पटरी जमाएु, कमर से तछवार छटकाएं,
चेहरे को नकात्र से छिताएं, अनब शोखी और बोॉकपन के साथ लड़ाई
ज९२ आज़ाद-कथा
में शरीक होने के लिये झाईं है । उपके, लाभ. दूस जवान » औरते घोड़ों पर
सवार चली आ रही हैं | झुखबिर ने हृव औरतों को कुछ ऐसी तारीए
की. कि छोग “सुनकर दंग रह गए। बोला--इस रहेसजादी ने।कप्तम
खाई है,क्ि उम्र-भर क्वॉरी रहूँगी | इसका बाप एक मशहूर .जनरलू था,
उसने अपनी प्यारी वेडी को शहसवारी का फन ख़्बव सिखाया था। रूस
में बस यही एक औरत है जो तुर्कों से सुकाबछा करने के -छिये मैदान
में आई है । उसने कप्तम खाई है कि झाज़ाद फा प्िर- लेकर जार के
कठमों पर,रख हूँगी। हैक ५० * [७
आज्ञाद--भूलछा,, यह दो बतलाओ कि अगर वह रईस, की ,छडफी
है तो उसे मैदाव -से क्या सरोकार ? फिर सेरा नास उच्धफ्ो क्योंकर
साछूम हुआ ? 05" २६ ६> ५ प्र
सुखबि(>अच यह तो हुज़ूर वही जानें, उनका नाम -मिस क्लारिसा
है | वह थापसे तलवार का सुकाबिला करना चाहती है। मैदान में
अकेले आप से छड़ेंगी, जिस तरह पुराने ज़माने से पहलवानों सें लढाई
कारिवाज था। , हक
आजाद पाशा के चेहरे का रंग डड़ गया । अफ़ुपरों ने उनको ,बनाना
शुरू किया। भ्राज़ाद ने सोचा, अ्रगर कब्ठूछ किए लेता हूँ तो नठीजा क्‍या!
ज्ञीता, तो कोई, बडी बात नहीं । छोरा,-कहेँँगे,. छडना-भिडना औरतों
का काम नहीं+ अगर चोट, खाह़े तो जग हँसाई होगी । मिस. सीडा ताने
दुँगी । अलारदखी आड़े, हाथों लेंगी, कि एक छोकरी से चरका खा
गए । सारी डींग,खाक में मिल गई। श्रौर आर इनकार करते हैं तो भी
तालियाँ बजेंगी कि एक नाऊुऊबदन क्षोरत्त के सुकाबिले :से भागे। जब
खुद कुछ फैसला न कर सके तो पूछा--दिल्‍्छगी तो हो चुकी,,अब
चतकाइए,कि मुके क्या करना चाहिए 2, , - _ / «८ , *
आज़ाद-कथा ७०३
जनरल--सकाह यही है कि अगर चापको धहादुरी का दावा है तो
. कबूछ कर छीजिए, वरना झुपके हो रहिए
भाज़ाद--जनाव, खुदा ने चाहा, तो' एक चोट न खार्ज जौर बेदाग
लौट आऊ | औरत ऊाख दिल्लेर हो फिर औरत है !
|
जमनरल-यहाँ मुछों पर ताव दे छीमिए, मगर पहाँ कछई खुल
जायंगी । !
“ अनवर पाशा--जिम् वक्त वह हसीना हथियार समकर सासने झाएगी,
होश उड भायँंगे । ग़श पर ग़श शआर्येंगे । ऐसी हसीन झोरत से लड़ना
क्या कुछ हँसी है ! हाथ न उठेंगा । मु ह को स्ाश्नोगे। उस्तकी एक निसाह
तुम्हारा क्ाम-तमास कर देगी ।
“आजाद+-इसकी कुछ परवा नहीं। यहाँ तो दिली भारजू है कि
किसी साजवीन की निभाहों के शिकार हों । ५
यंही बातें हो रही थीं कि एक भादमी ने भाकर क्हा+-कोईह। साहप
हजरत बाज़ाद को हू दृते हुए आए हैं । अगर हुक्म हो, तो छुछा छाऊँ ।
बड़े तीखे आदमी हैं । मुकमे छड़ पडे थे। आज़ाद ने फहा, उसे अन्दर
आने दो। सिपाही के जाते ही मियाँ सोजी श्कड़ते हुए आ पहुँचे ।
शआ्रज़ाद--मुंदत के बाद मुलाकात हुई, कोई ताज़ा खबर कहिए ।
ख़ोज्ी--कमर तो खोलने दो, भफ़ीम धोछू, चुसक्नी छगाओँ तो होश
आएु। इस वक्त थका-मॉाँदा, मरा-्पिटा आ रहा हूँ। साँस तक नहीं
समाती है। रे
श्राज़ाद-->प्रिस मीडा का द्वार तो कहो ! हि
ख़ोजी-रोज़ कुम्मैत घोड़े पर सवार दृरिया-किनारे जाती हैं। रोज़े
अ्रखबार पढ़ती है । जहाँ तुम्हारा नाम श्राथा, बस, रोने ऊगीं ।
श्राज़ाद--अरे, यह अंगुली में क्या हुआ है जी ! जल गई थी क्या ?
क्‍
खोजी--जऊ नहीं गई थी जी, यह श्रपनी सूरत गले का हार हुई।
श्राजादु-ऐं, यह साजरा कया है ? एक कान कौत कतर छे गया. है !
खोज्नी--व हम हतने हसीन होते न परियाँ जान देतीं-!...
आज़ाद--नाक़ भी कुछ चिपदी माछूम होती है । |
- खोजो -ल्लूत्त, छूरत ! यही छूरत वछा-ए जाव, हो गईं। इसी के
हाथों यह दिन देखना पढ़ा । ५६,
आज़ाद--प्रत-भूरत नदीं, आप कहीं से एटकर आए हैं। कप्त
जोर, मार खाने की निशानी, किसी से भिड पड़े होंगे। उसने ठोक डाला
होगा ! यही बात हुई ह त ? कट 4
खोजी--अजी, एक परी ने फूठों की छड़ियों ले सजा दी थी ।
झाजाद--भच्छा, कोई खत-यत्त भी छाए हो ,या चले थ्राए यों ही
5०४ श्राज़ाद-कथा
हाथ भुलाते ?
खोजी--दो दो खत हैं । एक मिस मीडा का, दुधरा हुरछुजनी का।
- आजाद शौर'खोजी नहर के किनारे बैठे बातें कर रहे थे। अब जो
आता है, खोजी को देखकर हँसता है। थ्रान्विर खोनी ब्रिगठकर बोले --
क्या भीड़ लूमाई है ? चलो, अपना काप्त करो ।
आज़ाद-्तुमको किसी से क्या वास्ता,'खड़े रहने दो ।
खोजी-+अमती नहीं, आप समकते नहीं हैं। ये लोग नजर लगा देंगे।
आज़ाद-हाँ, आपझका फहला-ठश्छा देखकर नज़र “ऊरूग जाय नो
साज्जुब भी नहीं । !
खोजी--भज्री, वह एक सूरत ही क्या कम है ! और कृतम छे.को कि
किस मर्दक को अरब तक माछूम हुआ हो कि हम इतने हतीव हैं ! शोर
हमें हुसका कुछ ग़रूर भी नद्ीं--
मुतलक नहीं गरूर जमालोकमाल पर ।
काज़ाइ-कथा ण्र्‌ण

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