नंग सेक्स फल्म करते हुए

प्राजाद -- जी हाँ, चाकमाछ छोग कभी रासूर नहीं करते,, सीघे-सादे
होते ही हैं | श्रच्छा, आप अफीम घोलिए, साथ है या नहीं ?
खवोजी-+मी नहीं,और फ्या ! आपके भरोसे भाते हैं? अच्छा,लाश्रो,
निकठयाओ । मगर जरा उम्दा'हो | कप्सरियथ के साथ तो होती होगी ?
आजाद -अ्रव तुम मरे । भला, यहाँ अफ़ीस कहाँ ? भीर कमप्तरियट
में ! क्या जूब ! न्‍
बोजी-तब हो वेमोंत मरे । भरें, किसी से माँग ली | ,
आज़ाद-- यहाँ क्फीम का किसो को शी दी नहीं ।
खोजी--इतने घरीफ़तादे है श्लीर श्रफीमची एक भी नहीं ? वाह !
आज़ाद--की हाँ, सब गँंवार हैं। मगर प्राज दिज्लगी होगी, जब
अफीम न मिलेगी शोर तुम तड़पोगे, विछविक्ाओोगे । ,
” शोजी-यह तो श्री से जम्हाहयाँ आने छपी । कुछ तो फिक्र करो चार !
बकाजाद--भ्रव यहा जफीम न मिलेगी | हां, करोंलियाँ जितनी चादह्दो
मेगा दूँ।
खोजी--(अकीम को डिब्रिया दिखाकर) यह भरी है शझ्फीम ! क्‍या
डल्छू समके ये ! जाने के पहले हो मैंने हुरघुजनों से कहा कि हुजूर श्रफी म
मँगवा दें । प्रच्छा, यह लीजिए हुरसुननमी का खत ।
अज़ाद ने खत खोला तो यह लिखा धा+-: * .,
5 माह डियर आजाद?!
जरा खोजी से खैर व श्राफ़ियत दी प्रछिए, इतना पिटे क्विढो दाँत
हट गए, कान कट गए, शोर घूसे श्रीर मुक्‍्के खाप। श्राप इनसे इतना
पूछिएु, कि छालारुखं कोन है? |: 2. डे
ह ' 5. तुम्हारा
२ हे « हुरसुजा?
५०६ अाजादन्कथा
आाजाद-*क््यों साहब, यह लालारुख़ कौन हैं ?
खोजी--घोफ़ भोद, हम पर चक॒प्ता ववछ' गया । , बाहरे हुरसुमजो,
बढ्छाह ! अगर नमक न खांए होता तो जाकर करोली भोंक देता ।
श्राज़ादू-नदीं, - तुम्हे ' वल्छाह, बताश्रो तो ? यह लाल[एत
कौन है? ' $*
खोजी--+भच्छा हुरसुभजी, सम्ेंगे !
सोदा करेंगे दिल का किसी दिलरुबा के साथ, '
इस वावफ़ा को बेचेगे एक, बेवफा के हवाथ ।
| हाय छालारुख, जान जाती है, मगर सौंच भी नहीं आती ।
। आजादर-पिटे हुए हो, छुछ हाल तो बतलाश्रो | हसीन है ?
खोजी--(फश्छाकर) जो नदी हसीन नहीं हैं। काली-कछूटी है-'
आप भो वढ्छाह निरे चोंच हो रहे | "भरा, कियी ऐवी-बैधी को जुर्रत
कैसे होतो; कि हमारे साथ बात करती । याद रफ़्खों, हछ्ीन पर
जब नज़र पढेगी, हमीन ही की पड़ेगी । दुसरे की मजाल नहीं ।
' शालिव' इन सीमी तनो के वास्ते, ४
9] * चाहनेवाला,भी अच्छा चाहिए। , .,
आनाद--भच्छा,, भब लालारुख का तो हाल बताओ ॥
खोजी--अजी, अपना काम करो, इस वक्त दिल' काजू में 'नहों है ।
वह हुस्न है. कि आपके वाबाजान ने भो न देखा होगा । -सगेर हार्थों' में
चुल है। घंटे-भर से पाँच-खात बार जरूर |चपतियाती थीं । खोपड़ी
पिलफिली ,कर दीं। बस,- हमको हप्ती वात से नफ़रत थी । चरना, नख-
शिख से दुरुस्त | और चेहरा चम्रऊता हुश्ा, जैसे, आवनूत् ! एंक दिन
दिल्‍लगी-दिव्लगी में उठकर एक पचास जूते छूगा दिए, तड़-तड़-तड !
है, हैं, यह क्या दिसाकत है, हमें यद्व दिर्खगी पश्तन्द्‌ नहीं, मगर वह
+ ब्द
खाज़ाठ-कथा ज्‌द्छ
सुनती किप्तकी है ! अर फरमाइए, जिस पर पचाए जूते पट़ें, बखकी क्या
गति होगो । एक रोज़ हँसी-हँ सी से काव काट लिया । एक दिन दुकान
# पर खडा हुआ, सौदा खह्द रहा था। पीछे से आकर दूस जूते छगा
' द्िए। एक मरतवे एक होज से हमको ढ फेल दिया । नाक हूट गई, मगर
है लाखों में ठाजवाव !
त्जे निगद ने छीन लिए जादिदो के दिल,
आँखें जो उनकी उठ गई दस्ते-दुआ के साथ |
आज़ाद--वो यह कहिए, हँली हँ दी मे ज़ूप जूतियाँ खाईं आपने ।
खोजी --फिर यह तो है ही, ओर इदृश्कफ कह्ठटते किऐे हैं। पुर दफ़ा
में सो रहा था, थआने के साथ ही इस जोर से चाधु छ जमाई कि सें तड़प-
कर चीज़ उठा । बच्च, आ्राग हो गई कि हम पीर्टे, तो तुम रोओो क्यों?
जाओ, बच, अब हम न बोलेंगी । रास भमनाया मगर बात तक न की ।
। आखिर यह सलाह ठहरी फ़ि सरे बाज़ार बद हमें घपतियाए और हम
घिर क्ुकाए खड़े रहें ।
लब ने जो जिलाया तो तेरी आँख ने मारा;
कातिल भी रहा साथ मसीद्दा के हमेशा ।
परदा न बठाया कभी चेहरा न दिखाया;
मुश्ताक रहे हम रुखे जबा के हमेशा ।
शाजाद-करिस्ती दिन 6 सछी-हैँली से आउको जदर ते खिला दे ?
खोजी -तर्यो साहब,खिला दे क्रो नहीं कहते? कोई कण्डेवाली म्ुकृ-
रंर की है। वह भी रईपधजादी ऐ ! आपकी प्रिथ् मौडा पर गिर पड़े तय
कुचल जायें । श्रच्छा, हमारी दास्तान तो सुन चुके, अपनी बीची कहो ।
अ्राजाद --एक चामनीच हमसे तलूवार छड़ना चाइती है । क्यारा
छठ
च अथथ.. क्‍्थणजक.क
७९८ आज्ञाद-कथा
है पैग़ाम सेजा है कि किपी दिन आज़ाद पाशा से ओर हमसे श्ररेहे
चलवार चले।
' खोजी--सगर तुमने पूछा तो होता कि पिन क्या है? शस्‍ल-प्रत
कैसी है १-
आज़ाद--सब पूछ चुके हैं। रूप में उसका सानी नहीं है.। मिप्
मीडा यहाँ होतों तो खर्च दिल्‍्लगी रहती | हाँ,, तुमने-तो उनका खत
दिया ही नहीं । तुम्हारी बातों में ऐसा उलका कि उसकी याद
डीनरही।
खोजी ने मीडा का ख़त निकालूफर दिया। यह सजूमृत था -
“प्यारे आजाद,
आजकल अखबारों ही में मेरी जान बसती है। सगर कभी-कमी
ख़त भी तो भेजा करो । यहाँ जान पर बन शझआई है, ओर तुमने वह
चुप्पी साधी है कि खुदा की पनाह। तुमसे इस वेवफ़ाई की उस्मेद
नथी।
यो तो झुँद-देखे की होती है मुहष्बत सबको,
जब में जानूँ कि मेरे बाद मेरा ध्यान रहे ।
तुम्हारी
/ मसीडा!?
अरसठवाँ परिच्छेद
दूधरे दिन आज़ाद का उस रूसी नाजनीन से मुकाबला था। आजाद
को रात-मर नींद नहीं आई । सबेरे उठकर बाद्वर आए तो देखा कि दोनों
तरक की फोर्जे मामसने-सामने खड़ी है! और दोनों तरेफ से तोपें चल रही हैं ।
'

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